Thursday, March 24, 2011

सांसत में पाकिस्तान के अल्पसंख्यक

सांसत में पाकिस्तान के अल्पसंख्यक
हमेशा कश्मीर-कश्मीर चिल्लाने वाले और भारत में मानवाधिकारों के तथाकथित उल्लंघन पर घड़ियाली आँसू बहाने वाले पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ कैसा अत्याचार हो रहा है। इसका उदाहरण हाल ही में पांच बच्चों की मां 45 वर्षीय ईसाई महिला आसिया बीबी को एक निचली अदालत द्वारा दी गई मौत की सजा है। पाकिस्तान में लागू ईशनिंदा कानून के तहत यह सजा सुनाई गई है। इसके पहले भी कई गैर-मुस्लिमों को इस कानून के तहत सजाए दी गई है। सबसे चर्चित मामला वर्ष 1994 में एक 11 वर्षीय ईसाई युवक सलामत मसीह का है। जिसने सारी दुनिया का ध्यान पाकिस्तान के इस काले कानून की तरफ खींचा था।पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक के शासनकाल में ईशनिंदा कानून बनाया गया था, जिसमें यह प्रावधान था कि अगर कोई व्यक्ति इस्लाम या मोहम्मद साहब की निंदा करता है तो उसे आजीवन कारावास की सजा दी जाए। सन् 1992 में नवाज शरीफ ने इस आजीवन कारावास के प्रावधान को फाँसी की सजा में बदल दिया था। यह कानून मुसलमानों पर नहीं बल्कि गैर-मुस्लिमों पर ही लागू होता है। इसका अर्थ यह है कि अगर कोई मुसलमान गीता, बाइबिल या गुरुग्रंथ साहब की निंदा करता है या हिंदू देवी-देवता, ईसा मसीह अथवा गुरुनानक आदि की आलोचना करता है तो उसे कोई सजा नहीं दी जा सकती। हाँ, कोई मुसलमान अगर अपने धर्म और मुहम्मद साहब की निंदा करता है तो वह ईशनिंदा कानून की गिरफ्त में आ जाता है। जाहिर है कि ईशनिंदा कानून धार्मिक भेदभाव पर अधारित है और पिछले दो दशकों से इसका भीषण दुरुपयोग हुआ है। पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरपंथी लगातार उग्र होते जा रहे है। वहां के राजनीतिक दलों, प्रशासन एवं सेना तक में इनकी गहरी घुसपैठ हैं। उन्होंने ईशनिंदा कानून में किसी भी तरह के बदलाव किये जाने के विरुद्ध सरकार को चेतावनी दी है। पाकिस्तान में हिंदुओं के अलावा ईसाई भी अल्पसंख्या में है। उनकी आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है। इसका लाभ उठाने के लिए कट्टरपंथी इस्लामिक समूह उन्हें अपना निशाना बनाए हुए हैं। वर्ष 2009 में कराची शहर में ईसाइयों की एक बस्ती पर तालिबान ने धावा बोलकर कई निर्दोष को मौत के घाट उतार दिया था और उन्हें इस्लाम ग्रहण करने की धमकी दी थी। तालिबान कराची एंव पूरे सिंध में शरीया लागू करना चाहता है।
इस्लाम के नाम पर अस्तित्व में आया पाकिस्तान आज अपने ही फैलाये हुए धार्मिक कट्टरपन के भंवर में फंस गया है। यहां के अल्पसंख्यक डर और खौफ के साये में जी रहे हैं। कट्टरपंथी समूहों के बाद अब यहां इस्लाम का तथाकथित रक्षक ‘तालिबान’ खड़ा हो गया है, जो बंदूक की ताकत से पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों पर हर हलात में ‘इस्लाम’ थोपने पर तुला हुआ है और उसके निशाने पर ईसाई समुदाय है। भारत के मामले में जिस तरह वैटिकन एवं अन्य यूरोपीय देश ईसाई मामलों को लेकर दखलअंदाजी करते हैं, वह स्थिति पाकिस्तान के मामले में नहीं है। हालांकि भारत में हिन्दू एवं अन्य धर्मावलम्बी ईसाइयत के प्रति हमेशा सहज ही रहे हैं। यहां कोई किसी को ईसाइयत छोड़ने के लिए नहीं कहता। हमारे यहां छुट-पुट टकराव की नौबत तब आती है जब कुछ लोग दूसरे के धर्मों के अदरुनी मामलों में हस्तक्षेप करने लगते हैं। यहां के कुछ ईसाई नेताओं ने विश्व पटल पर भारत को एवं हिन्दू समुदाय को बदनाम करने का ठेका उठा रखा है। ऐसे नेताओं को पाकिस्तान के हलातों से सीख लेते हुए देश में तनाव बढ़ाने वाली गतिविधियों को बंद करना चाहिए।समय की मांग है कि वेटिकन एवं अन्य यूरोपीय देश पाकिस्तान में मानवाधिकारों का हनन करने वाले काले कानूनों के विरुद्ध अपनी आवाज उठाएं। पाकिस्तान के गरीब ईसाइयों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए कदम उठाये जाए। दरअसल पाकिस्तान के बहुसंख्यक ईसाई दलित जातियों से है और उन्होंने अविभाजित भारत में अंग्रेजी राज के समय ईसायत की दीक्षा ली है। ईसाई ही नहीं हिन्दू समुदाय भी इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों का निशाना बना हुआ है। पाकिस्तान में 1947 में जिनते हिन्दू थे उसमें अभी आधे रह गए हैं। कट्टरपंथी समूहों ने गैर-मुसलमानों के अलावा उन मुसलमानों को भी नहीं अपनाया जो विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए थे, उन्हें आज मोहाजिर कहा जाता है। जिस राष्ट्र का निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना मोहाजिर था, आज उसी राष्ट्र में मोहाजिरों के खिलाफ उग्र आदोंलन हो रहा है। मोहाजिरों को अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए ‘मोहाजिर कौमी मूवमेंट’ जैसा राजनैतिक संगठन खड़ा करना पड़ा है। जिन्ना ने भले ही द्वि-राष्ट्र सिद्धांत दिया हो लेकिन उनके उत्तराधिकारियों ने धार्मिक भेदभाव शुरू कर दिया।सबसे पहले अहमदिया मुसलमानों को इस्लाम से बाहर किया गया फिर हिन्दू मंदिरों एवं गुरुद्वारों को तोड़ा गया। अहमदिया मुसलमानों को अपने नाम के आगे मुसलमान लिखने पर पाबंदी लगा दी गई। जनरल जिया-उल-हक ने इस्लामीकरण का जोरदार आदोंलन चलाया और ईशनिंदा कानून अस्तित्व में आया। सारे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की कैसी दुर्दशा है यह आसिया बीबी की स्थिति को देखकर पता चलता है। ऐसे पाकिस्तान को भारत में मानवाधिकारों का मसला उठाने की नैतिक छूट कैसे दी जा सकती है? हिंदू और ईसाई अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के मामलों ने सारी दुनियां की आँखें खोल दी हैं। मगर पाकिस्तान की आँखें अभी नहीं खुली हैं। अब देखना होगा कि पाकिस्तान सरकार आसिया बीबी के मामले में क्या कदम उठाती है।
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कालेधन का छीजता सुरक्षा कवच

कालेधन का छीजता सुरक्षा कवच
दुनिया में करचोरी और भ्रष्ट आचरण से कमाया धन सुरक्षित रखने की पहली पसंद स्विस बैंक रहे हैं। क्योंकि यहां खाताधारकों के नाम गोपनीय रखने संबंधी कानून का पालन कड़ाई से होता है। बैंकों के खाते में खाताधारी का केवल नंबर रहता है। नाम की जानकारी कुछ ही अधिकारियों को रहती है। ऐसे ही स्विस बैंक से सेवा निवृत एक अधिकारी रूडोल्फ ऐल्मर ने दो हजार भारतीय खाताधारकों की सूची विकीलीक्स को सौंपी है। तय है, अंसाजे देर-सबेर इसे इंटरनेट पर डाल देंगे। फ्रांस सरकार ने भी हर्व फेल्सियानी से मिली एचएसबीसी बैंक की सीडी ग्लोबल फाइनेंशल इंस्टीट्यूट को हासिल कराई है, जिसमें अनेक भारतीयों के नाम दर्ज हैं। स्विस बैंक एसोसिएशन की तीन साल पहले जारी रिपोर्ट के हवाले से स्विस बैंकों में कुल जमा भारतीय धन 66 हजार अरब रुपए है। स्विस और जर्मनी के अलावा दुनिया में ऐसे 69 ठिकाने और हैं जहां काला धन जमा करने की आसान सुविधा हासिल है। भारत मामले को कर चोरी और दोहरी कराधान संधियों का हवाला दे टाल रहा है। तर्क है कि खाताधारियों के नाम सार्वजनिक करने के लिए चल रहे करारों को बदलना होगा। बहरहाल सरकार का रुख काले धन की वापसी के लिए साफ नहीं है। यह इससे जाहिर होता है कि कुछ समय पहले भारत और स्विट्जरलैंड के बीच दोहरे कराधान संशोधन के लिए संशोधित प्रोटोकॉल संपादित हुआ था। लेकिन इस पर दस्तखत करते वक्त भारत ने कोई ऐसी शर्त नहीं रखी जिससे काले धन की वापसी का रास्ता प्रशस्त होता। दुनिया में 77.6 प्रतिशत काली कमाई ट्रांसफर प्राइसिंग (संबद्ध पक्षों के बीच सौदों में मूल्य अंतरण) के जरिए पैदा हो रही है। भारत में संबद्ध फर्मों के बीच इस तरह के मूल्य अंतरण में हेराफेरी रोकने का प्रयास 2000 के आसपास वजूद में आने लगा था। सरकार इसे और कड़ा कर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की सोच रही है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्तराष्ट्र ने एक संकल्प पारित किया है, जिसका मकसद है गैरकानूनी तरीके से विदेशों में जमा काला धन वापस लाया जा सके। इस पर भारत समेत 140 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं और 126 देशों ने तो इसे लागू कर काला धन वसूलना शुरू भी कर दिया है। यह संकल्प 2003 में पारित हुआ था, लेकिन भारत सरकार इसे टालती रही। आखिरकार 2005 में उसे हस्ताक्षर करने पड़े लेकिन इसके सत्यापन में अब भी टालबराई हो रही है। स्विट्जरलैंड के कानून के अनुसार कोई भी देश संकल्प को सत्यापित किए बिना विदेशों में जमा धन की वापसी की कार्रवाई नहीं कर पाएगा। हालांकि स्विट्जरलैंड सरकार की संसदीय समिति ने इस मामले में भारत सरकार के प्रति उदारता बरतते हुए दोनों देशों के बीच हुए समझौते को मंजूरी दे दी है। मतलब स्विट्जरलैंड भारत के सहयोग को तैयार है लेकिन भारत ही कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते पीछे हट रहा है। पश्चिमी देशों को मंदी की मार ने यह समझ दी कि काला धन उस आधुनिक पूंजीवाद की देन है जो विश्वव्यापी आर्थिक संकट का कारण बना। 9/11 के आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका की आंखें खुलीं कि दुनिया के नेता, नौकरशाह, कारोबारी और दलालों का गठजोड़ ही नहीं आतंकवाद का पर्याय ओसामा बिन लादेन भी अपना धन इन बैंकों में जमा कर दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। नतीजतन पहले जर्मनी ने ‘वित्तीय गोपनीय कानून’ शिथिल कर काला धन जमा करने वालों के नाम उजागर करने के लिए स्विट्जरलैंड पर दबाव बनाया और फिर इस मकसद पूर्ति के लिए इटली, फ्रांस, अमेरिका एवं ब्रिटेन आगे आए। अमेरिका ने स्विट्जरलैंड पर इतना दबाव बनाया कि वहां के यूबीए बैंक ने कालाधन जमा करने वाले 17 हजार अमेरिकियों की सूची तो दी ही, काले धन की एक राशि भी वापिसी भी कर दी। मुद्रा के नकदीकरण से जूझ रही पूरी दुनिया में बैंकों की गोपनीयता समाप्त करने का वातावरण बनना शुरू हो चुका है। इसी दबाव के चलते स्विट्जरलैंड सरकार ने कालाधन जमा करने वाले देशों की सूची जारी की है। इसमें दो हजार भारतीय खाताधारियों के भी नाम बताए जा रहे हैं। इस अंतरराष्ट्रीय काले कानून को खत्म करने के दृष्टिगत अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बन रहा है।
स्विस बैंकों में काला धन जमा करने का सिलसिला दो शताब्दियों से चल है। लेकिन कभी किसी देश ने आपत्ति नहीं की। आर्थिक मंदी का सामना करने पर पश्चिमी देश चेते और कड़ाई से पेश आए। 2008 में जर्मनी की सरकार ने लिश्टेंस्टीन बैंक के कर्मचारी हर्व फेल्सियानी को धर दबोचा जिसके पास कर चोरी करने वाले जमाखोरों की सूची की सीडी थी। इसमें जर्मनी के अलावा कई देशों के लोगों के खातों का ब्यौरा था। लिहाजा जर्मनी ने उन सभी देशों को सीडी देने का प्रस्ताव रखा जिनके नागरिकों के सीडी में नाम थे। अमेरिका, ब्रिटेन और इटली ने तत्परता से सीडी की प्रतिलिपि हासिल कर धन वसूलने की कार्रवाई भी शुरू कर दी। फ्रांस के हाथ भी एक ऐसी सीडी लगी। फ्रांस ने अमेरिका, इंग्लैंड, स्पेन और इटली के साथ खाताधारकों की जानकारी बांटकर सहयोग किया। दूसरी तरफ ऑर्गनाइजेशन फॉर इकॉनोमिक कापरेरेशन एंड डवलपमेंट इंस्टीट्यूट ने स्विट्जरलैंड समेत उन 40 देशों के बीच कर सूचना आदान-प्रदान संबंधी 500 से अधिक संधियां कीं। शुरूआती दौर में स्विट्जरलैंड और लिश्टेंस्टीन जैसे देशों ने आनाकानी की, लेकिन अंतत: अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे उन्होंने घुटने टेक दिए। अन्य देशों ने भी ऐसी संधियों का अनुसरण किया, लेकिन भारत ने अब तक एक भी देश से संधि नहीं की है।
(Courtesy : राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली, १७ फरवरी २०११)

Hasan Ali's close aide Kashinath Tapuria arrested

Mumbai: The Enforcement Directorate (ED) today arrested Kolkata-based businessman Kashinath Tapuria, an associate of Pune-based stud farm owner Hasan Ali Khan, accused of money-laundering and tax evasion.Tapuria was arrested after three days of questioning, ED sources said.Meanwhile, Khan's chartered accountant, Sunil Shinde, has been asked to appear before the ED for questioning. The ED had conducted searches at his residence in Pune yesterday.Fifty-three-year-old Khan has been arrested by the agency on charges of stashing huge amounts of black money in banks abroad. He is also facing a Rs. 70,000-crore tax demand notice from the Income-Tax department.



Cash-for-Votes: Probe or eyewash?k to Expand & Play
New Delhi: Home Minister P Chidambaram may have said in Parliament that the cash-for-votes scandal was being probed by the Delhi Police, but in over 30 months of investigation, the three BJP MPs who brought wads of notes to Parliament to show that an attempt had been made to buy them have still not been questioned. (Read: Cash-for-votes scam probe to be completed soon, says Chidambaram)Speaking exclusively to NDTV, Ashok Argal, one of the MPs, has said that he has not been contacted by any probe agency or the police so far. Mr Argal also denied there was any entrapment, and said he would be willing to be investigated again."I have not been contacted by any probe agency. The police have not tried to contact me," said Mr Argal.Not just Mr Argal, but former BJP MP Mahveer Bhagora, who was among the three MPs who brought cash into Parliament, also says he has not been questioned so far by the police or any other agency.

"Two to three people had contacted our party leader Sri Ashok Argal to support the government. In return they promised a huge sum. When we came to know about the conspiracy, we told our party leaders. Our leaders advised us to take the money and and come to the House, where the entire matter would be disclosed," said Mr Bhagora.He also insists that a Samajwadi Party leader contacted Mr Argal and offered them a huge amount of money. "At first an MP from the Samajwadi Party approached us, then two more people also approached us."The fact that the key players in the cash-for-votes scandal have not been questioned, in over 30 months of investigations, raises questions on the seriousness of the government. In fact, Arun Jaitley, Leader of the Opposition in Rajya Sabha, accused Home Minister Chidambaram of a cover-up when he announced that a probe is on.On July 22 2008, Dr Manmohan Singh won the vote of confidence by a slim margin. The Left had quit the government over India's nuclear deal with the US. In the days leading upto the vote, there were hectic political negotiations to win new friends and influence people.The cash-for-votes scam erupted hours before the vote of confidence took place when three BJP MPs walked into the Lok Sabha with cash that they said added upto three crore rupees. They claimed that that they had been offered this money to vote for the nuclear deal and had planned a sting operation to prove this.A Lok Sabha committee, headed by Congress MP KC Deo, was set up to examine their allegations, but found that there was no evidence of the BJP's claims.