Friday, October 29, 2010

क्वीन्स बैटन विरॉध सही

क्वीन्स बैटन विरॉध सही

शिवराज सिंह चैहान ने ठीक कहा। राष्ट्रमण्डल खेल और उसको शुरू करने के लिए सदस्य देशों में घुमायी जाने वाली (रानी की छड़ी) गुलामी की प्रतीक है। बौद्धिक क्षत्रियता दिखाते हुए उन्होंने छड़ी लेने से मना कर दिया और देशभक्ति की लाज बचायी। ये राष्ट्रमण्डल खेल और समूचा मण्डल ही उन देशों का जमावड़ा है जो कभी अंग्रेजों की बर्बर दासता के शिकार रहे थे और आज भी वे ब्रिटेन की उस रानी को अपना प्रमुख मानते हैं जिसके पुरखों ने हमारे पुरखों पर सिर्फ इसलिए जुर्म ढाए थे क्योंकि वे हिन्दुस्तानी थे और उनका धर्म, उनकी सम्पदा, उनकी अपार धन सम्पत्ति लूटकर लंदन ले गये।

1911 में जार्ज पंचम के सिंहासनारूढ़ होने की खुशी में फेस्टिवल आफ अम्पायरशुरू हुआ। जिसमें साम्राज्य के अन्तर्गत गुलाम देशों में कुछ खेल प्रतियोगिताएं हुईं।’ 1930 से 1950 तक इन खेलों को ब्रिटिश अम्पायर गेम्स तथा 1966 से 1974 तक ब्रिटिश कॉमनवेल्थ गेम्स कहा जाता रहा। केवल 1978 से उनके नाम के आगे से ब्रिटिश शब्द हटा पर ब्रिटेन की रानी हमेशा इसकी प्रमुख रहीं और रानी की छड़ी,हमेशा बकिंघम पैलेस से रानी के हाथों ही जारी होती रही। शर्म इस बात की है कि जो लोग भांति-भांति के परचम उठाए राजसिंहासनों के विरुद्ध चिल्लाते रहे वे रानी की छड़ी को परम पवित्र सेकुलर बख्शीश मानकर उसके आगे घुटने टेक रहे हैं और इस राज में कामनवेल्थ देशों की ऐसी प्रथम राष्ट्राध्यक्ष होने का गौरवहमारी राष्ट्रपति को मिला, जिन्होंने स्वयं बकिंघम पैलेस जाकर रानी साहिबा के हाथों से छड़ी ली।

शाबास शिवराज! एक तो ऐसा शेर निकला जिसने राष्ट्रमण्डलीय दासता के विरुद्ध आवाज उठायी।

अयोध्या इसी का नाम है।

हर दासत्व तथा औपनिवेशिक कलुष के विरुद्ध भारतवर्ष का ध्वज उठाने का नाम है अयोध्या। कलंक, नरसंहार, अविद्या और अधर्म के विरुद्ध खड़े होने का नाम है अयोध्या। अशफाउल्ला खां और भगतसिंह को साथ लेकर अंग्रेजों जैसी हर सत्ता के विरुद्ध सामाजिक, सांस्कृतिक संकल्प का नाम है अयोध्या।

अयोध्या हिन्दू-मुस्लिम मुद्दा हो ही नहीं सकता। भारत और अभारत के बीच संघर्ष अयोध्या है। रावण की पराजय और जानकी की मर्यादा रक्षा अयोध्या है। यदि स्टेच्यू आफ लिबर्टी ध्वस्त कर ओसामा बिन लादेन का वहां निशान लग जाए तो उस निशान को मिटा पुनः लोकतंत्र की अभय-प्रदाता देवी की मूर्ति स्थापित करना अयोध्या-अनुष्ठान कहा जाएगा।

यह बात कैसे समझायी जाए कि राम के बिना इस देश की आत्मा को नहीं समझा जा सकता। जहां व्यक्ति जन्मते ही राम का नाम नवजात शिशु को सुनाए और जहां गांधी हो या धनिया मजदूर, अन्तिम सांसों के वक्त भी अधरों से राम नाम का उच्चारण करना चाहे, वहां जाने कहां से ऐसी सरकारें आयीं कि रामसेतु तोड़ा जाने लगा और रामभक्तों को सिर्फ इसलिए साम्प्रदायिक काफिर घोषित कर दिया क्योंकि वे अजुध्या जी में रामजन्मभूमि मन्दिर चाहते रहे।

अपने दिल पे हाथ रखो और पूछो अयोध्या में राममन्दिर नहीं बनेगा तो क्या सऊदी अरब में बनेगा?

पिछले सौ सालों में हिन्दुस्तान, वह हिन्दुस्तान जिसे सारी दुनिया हिन्दुस्तान मानकर आती रही, भौगोलिक दृष्टि से आधा हुआ है। सरजमीने हिन्दुस्तान। साम्राज्यों, राजाओं की तलवारों से परे वह भारतवर्ष जिसने दुनियाभर के सताए और मत-भिन्नता के प्रति घृणा से जन्मे अत्याचारों के शिकार समाजों को बेहिचक अपने यहां शरण दी, टूटा, कटा और घटकर आधा रह गया। उस आधे के भी एक हिस्से-कश्मीर को15 अगस्त 1947 के बाद चीन व पाकिस्तान ने हड़पा- आज जो नक्शा सर्वे आॅफ इंडिया छापता है वह मिथ्या है-यथार्थ कडुवा है। सवा लाख वर्ग किलोमीटर कश्मीर हमारे पास है ही नहीं। 1947 के बाद सिर्फ इतना ही नहीं हुआ। मीरपुर, मुजफ्फराबाद के नसरंहार हुए- सिर्फ हिन्दुओं पर जुल्म हुआ। और पांच लाख हिन्दू इसी आजाद, गणतंत्र के साए में शरणार्थी बना दिए गए।

एक दिन शरणार्थी बनकर देखो। श्रीनगर के संगबाजों की खुशामद करने वालों से कहो एक सर्वदलीय प्रतिनिधि मण्डल देशभक्त शरणार्थियों से भी मिलने भेजा जाए। क्या तब तक जम्मू नहीं भेजा जाएगा जब तक वे भी देश के विरुद्ध पत्थरबाजी न करने लग जाएं? तब उनके हकों को अरुन्धतीराय और सोनिया गरीबों का हकजानेंगी!

इस अन्याय को पलट देशभक्ति को तिरंगा इम्फाल से लाल चैक तक लहराने का नाम है अयोध्या।

जब कभी, किसी भी एक क्षेत्र में रावण की मर्यादाहीनता के विरुद्ध जन-आन्दोलन खड़ा होगा, वह अयोध्या-चेतना का प्रतीक होगा। जब कभी मर्यादा पुरुषोत्तम जानकी के सत्व की रक्षार्थ सामान्य जन के संगठन को खड़ा कर रावण परास्त करेंगे, हां उस क्षण दीपावली होगी, राम की अयोध्या में वापसी होगी।

इसमें हिन्दू मुसलमान कहां से आ गया?

एक वह है जो भारत का है, एक वह है जो भारत का नहीं। एक वह है जो हमारा है, एक वह है जो हमलावर है।

इसमें जाति, मत, पंथ, सम्प्रदाय की बात ही कहां से उठती है?

स्वदेशी आन्दोलन स्वदेशी के लिए था। जो अपना है, जमीन से जुड़ा है, सांझा है, विवेक और संस्कारों की गंध लिए है, वह स्वदेशी है। स्वदेशी अयोध्या है।

वे जो कहते हैं मंदिर में क्या रखा है? राम तो घटघट के वासी हैं। अपने अन्तर्मन में झांको तो राम के दर्शन हो जाएंगे, वे यह सिर्फ हिन्दुओं को अध्यात्म का गूढ़ रहस्य समझाने का उतावलापन क्यों दिखाते हैं? जरा श्रीनगर में हजरतबल के सामने सर नवाकर यही परम सात्विक वचन वहां रह कर दिखाएं? सवाल है सदियों के बाद रामभक्त, अपनी ही अयोध्या में क्यों घुटे-घुटे से रहें? सरयू में बहते कारसेवकों का संघर्ष जिसने देखा, जिसने राजनीति का विश्वासघात झेला, वह सिवाय गांधी के सत्याग्रह के और किस रास्ते का अवलम्बन कर सकता है?

जो इसमें वोट बैंक का छल ढूंढ़ते हैं, तनाव और विद्धेष को फैलाने का प्रयास करते हैं, वे भारतीय आत्मा पर प्रहार करते हैं। जो भी हो, जैसा भी हो अपनों के साथ मिलजुलकर हो, यही अयोध्या है। हिन्दू-मुसलमान का मिलजुलकर रहना इस देश की प्राणरेखा है। वोट बैंक वालों की फिरकापरस्ती का जवाब, हिन्दू-मुस्लिम सांझेपन से जन्मी वतनपरस्ती से देना ही अयोध्या है। युद्ध और विद्धेष अयोध्या का विलोम है।

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